मुस्लमान

                   
एक समय था जब हमारी आजादी में मुसलमानो का भी समतुल्य योगदान  था,1857 के सिपाही विद्रोह से लेकर 1916 तक मुसलमानों का योगदान अतुलनीय रहा वे कम शिक्षा और कम संसाधन के बाबजूद प्रबल राष्ट्रवाद की अवधारणा के साथ खड़े रहे बाद में यानि 1857 के विद्रोह के बाद जिसमे सबसे ज्यादा बलिदान मुसलमानों ने दिया था,अंग्रेज अब यह बात समझ गए की 1857 जैसा विद्रोह दोबारा रोकने के लिए उन्हें साम्प्रदायिकता का सहारा लेना पड़ेगा,इसीलिए उन्होंने बांटो और राज करो की निति अपनायी और उच्च जातियों के हिन्दुओ को शिक्षा और रोजगार में अवसर अधिक देना शुरू कर दिया जिससे धीरे-धीरे मुसलमानों को अपना पिछड़ापन दिखने लगा और उनकी शिक्षा के लिए सन 1875 में सर सय्यद अहमद खान ने ‘अलीगढ मुस्लिम विद्यालय’ की स्थापना की और उनको अपने अधिकार और हितो को लेकर सचेत किया तभी से कांग्रेस मुस्लिमो के पक्ष में झुकने लगी और 1887 के कांग्रेस के बंबई अधिवेसन में बदरुद्दीन तैय्यब कांग्रेस के पहले मुस्लिम अध्यक्ष बने,वहीँ धीरे-धीरे अंग्रेज मुस्लिमो को हीन दशा में लाते गए और एक वक़्त वो आया जब मुस्लमान आर्थिक/राजनैतिक/सामाजिक रूप से अति पिछड़ गए और उनको उनके राजनितिक अधिकार देने के लिए सन 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना की और कांग्रेस का बहिस्कार ‘हिन्दुवादी संगठन कहके किया,लेकिन बाद में मुस्लिम लीग को कांग्रेस की राष्ट्रवाद की अवधारणा के आगे झुकना पड़ा और 1909 के मार्ले-मिंटो सविंधान सुधार में मुसलमनो को राजनैतिक संरक्षण प्राप्त हुआ  और 1916 में मुस्लिम लीग और कांग्रेस में समझौता हुआ जिसे लखनऊ समझौता के नाम से जाना जाता है| वहीँ दूसरी तरफ ऐसे संगठनो का उदय हुआ जो अंग्रेजी हित के लिए लड़ते रहे और और खोती हुयी राजनैतिक/सामाजिक एकाधिकार की साख बचाने में लगे रहे जिससे मुस्लिम लीग में एक बार फिर अन्दुरिनी विद्रोह पैदा हुआ और 1936 के बाद देश में हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे और हिंदूवादी उच्च जातियों को अंग्रेजो का सरंक्षण प्राप्त था ऐसा मानना है,जिससे गाँधी जी बहुत हतास और दुखी थे और उन्होंने कई आमरण अनशन दिए तथा बाद में मुसलमानों के हित के लिए 1940 में मोहम्मद अली जिन्ना जो पहले एक धर्म-निरपेक्ष नेता थे उन्होंने अलग मुसलमानों की रक्षा और सामजिक सौहार्द बनाये रखने के लिए अलग राष्ट्र पाकिस्तान की मांग की क्यूंकि देश में उस समय जबरजस्त दंगे हों रहे थे और हजारो लोगों की जान जा रही थी,गाँधी जी ने अलग राष्ट्र बनाये जाने के खिलाफ लड़ाई लड़ी और कांग्रेस का बहिस्कार किया लेकिन कांग्रेस ने अलग राष्ट्र की अवधारणा स्वीकार कर ली और 1947 में 15 अगस्त को दो राष्ट्रों का बटवारा हो गया लेकिन कांग्रेस ने शर्त रखी की जो मुस्लिम भारत में रहना चाहते है वो भारत में पूर्ण स्वंत्रता के साथ रह सकते है,बटवारे में में करीब 600000 लोगों की जान गई,उसके बाद भारतीय नागरिक सहिंता लागु की गई|
अब बात करते है आज की स्तिथि की आज मुसलमानो में सबसे बड़ी चुनौती उनकी शिक्षा की है आज करीब 42%( http://indianexpress.com/article/india/india-news-india/muslim-illiteracy-rate-india-census-report-education-3006798/ ) मुस्लिम निरक्षर है और शिक्षित भी कम ही है,वे आर्थिक-सामाजिक रूप से अत्यंत पिछड़े है,उनका गुजरा बहुत न्यूनतम से ही होता है मुसलमानों की स्तिथि पता लगाने के लिए 2005में सच्चर समिति का गठन हुआ,रिपोर्ट के मुताबिक मुसलमानों के बच्चे अत्यधिक कम संख्या में विद्यलय में पढते थे,वहीँ मुस्लिमो में केवल 23.7% लोग ही सरकारी नौकरी में और 6.5% ही लोग निजी क्षेत्र/व्यवसाय से जुड़े थे,वहीँ यदि उनकी उनकी आर्थिक स्तिथि को देखे तो उनकी प्रति व्यक्ति मासिक आय केवल 635 रु० थी,वही सशक्तिकरण में भी 6.6% मुसलमानों के बैंक अकाउंट(प्राइवेट सेक्टर) थे और 4.6% बैंक खाते(पी,एस.यु बैंक) ही थे,( http://www.prsindia.org/administrator/uploads/general/1242304423~~Summary%20of%20Sachar%20Committee%20Report.pdf ) वहीँ आज लगभग मुसलमानों की जनसँख्या 17 करोड़ है( http://www.census2011.co.in/religion.php ) और इनके पास संस्थान और संसाधन की भारी कमी है ये लोग कम शिक्षा के कारण धार्मिक कर्म-कन्डो में अति विश्वास रखते है तथा न्यूनतम का जुगाड़ पालन-पोषण के लिए भी अपने नाबालिक बच्चो से गैर-कानूनी कार्य करवाने लगते है| इनका न्यूनतम का जुगाड़ कैसे होता है इसकी फ़िक्र शायद किसी को है,इनकी गिरती शिक्षा को शायद ही कोई महत्त्व देता हो और शायद ही सच्चर समिति की सिफ़ारिशो पर ध्यान दिया गया हो क्यूंकि ये मुद्दा नहीं है आज मुद्दा यह है की मुस्लिम राष्ट्रवादी है या नहीं और उनके धार्मिक महत्वों को जबरजस्ती मुद्दा बनाया जा रहा है, यहाँ तक की आज अंधे राष्ट्रवाद से मुस्लिमो के शिक्षण संस्थानों पर वैचारिक आक्रमण किया जा रहा है हाल में अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यलय का मुद्दा है जो विद्यालय  मुस्लिम शिक्षा को महत्त्व देने के लिए खोला गया था क्यूंकि कुछ बुद्धिजीवी चाहतें है की मुस्लिम आगे ही न बड पाए और उनके विकास को अति राष्ट्रवाद के रूप बलि दे दी जाय|
आज सवाल है की मुसलमानों को ऊं कहना सिखाया जाये या उनके लिए होम की व्यवस्था की जाये मुझे लगता है की वो ॐ भी कह देंगे पहले उनके लिए होम की व्यवस्था कर दो|
आज कुछ बुद्धिजीवी लोग उनके बढती  जनसँख्या से चिंतित है जिससे जनसँख्या के रोकथाम के लिए उपाय पर सवाल न हो सके,मेरा मानना है उनके लिए स्कूल/मदरसे खोले जाये और उनको शरुआत से परिवार नियोजन की शिक्षा दी जाये लेकिन यह मुद्दा नहीं है आज मुसलमानों के राष्ट्रवाद पर सवाल खड़ा हो जाता है लेकिन उन सवाल करने वाले व्यक्तियों को इसकी जानकारी होनी चाहिए की मुसलमानों का देश में बलिदान अतुलनीय है और हमारी अनेकता में एकता हमारी पहचान सदियों से रही है अब देखने वाली बात होगी की कब तक उनके बाजिब मुद्दे कौन उठाएगा और कब उसको अमल में लाया जायेगा,आज सरकारें मुसलमानों का राजनैतिक प्रितिनिधित्व पर भी सवाल खड़े करते है और उनका हुलिया देखकर जरा देर में देशभक्ति का कीड़ा उन्हें काटने लग जाता है क्यूंकि इस बात को लेकर मुस्लमान सवाल न खड़ा कर सके की हमारी गरीबी अब तक गई क्यों नहीं या हमें आम अधिकार मिले क्यों नही आज भी स्वास्थ्य हमसे इतना दूर क्यूँ है,लेकिन एक न एक दिन इन सवालों का जवाब देना होगा.........!


बांकी स्त्रोत- India’s struggle for Independence( Bipin Chandra)

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