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Showing posts from January, 2017

मुस्लमान

एक समय था जब हमारी आजादी में मुसलमानो का भी समतुल्य योगदान  था,1857 के सिपाही विद्रोह से लेकर 1916 तक मुसलमानों का योगदान अतुलनीय रहा वे कम शिक्षा और कम संसाधन के बाबजूद प्रबल राष्ट्रवाद की अवधारणा के साथ खड़े रहे बाद में यानि 1857 के विद्रोह के बाद जिसमे सबसे ज्यादा बलिदान मुसलमानों ने दिया था,अंग्रेज अब यह बात समझ गए की 1857 जैसा विद्रोह दोबारा रोकने के लिए उन्हें साम्प्रदायिकता का सहारा लेना पड़ेगा,इसीलिए उन्होंने बांटो और राज करो की निति अपनायी और उच्च जातियों के हिन्दुओ को शिक्षा और रोजगार में अवसर अधिक देना शुरू कर दिया जिससे धीरे-धीरे मुसलमानों को अपना पिछड़ापन दिखने लगा और उनकी शिक्षा के लिए सन 1875 में सर सय्यद अहमद खान ने ‘अलीगढ मुस्लिम विद्यालय’ की स्थापना की और उनको अपने अधिकार और हितो को लेकर सचेत किया तभी से कांग्रेस मुस्लिमो के पक्ष में झुकने लगी और 1887 के कांग्रेस के बंबई अधिवेसन में बदरुद्दीन तैय्यब कांग्रेस के पहले मुस्लिम अध्यक्ष बने,वहीँ धीरे-धीरे अंग्रेज मुस्लिमो को हीन दशा में लाते गए और एक वक़्त वो आया जब मुस्लमान आर्थिक/राजनैतिक/सामाजिक रूप से अति पिछड़ गए और उनको …

आरक्षण - आर्थिक बनाम जातिगत

जी हाँ हो सकता है की आरक्षण का नाम सुनते ही कईयों के मन में घ्रणा उत्पन्न हो जाये और उनके मन में प्रबल राष्ट्रवाद उत्पन्न हो जाये,हो सकता है कईयों को कांग्रेस की धर्म-निरपेक्षता की निति का खयाल आ जाये,लेकिन आरक्षण को भी कई बुद्धिजीवियों ने समाज की आवश्यकता बताया है और कई बुद्धिजीवियों ने इसे सामाजिक टकराव का कारण बताया है और इसे सामाजिक न्याय का कलंक बताया है,आरक्षण शब्द सुनकर ज्यादातर लोगों को अनुसूचित जाति/जनजाति की याद आती होगी,जिसे गाँधी जी ने 1932 में हरिजन(हरि के जन) की संज्ञा दी थी| कुछ महान बुद्धिजीवी इसे जातिवाद कहतें है जो अभी तक मौजूद है,लेकिन यदि जाति ही न होती तो आरक्षण भी नहीं होता यह बात भी सत्य है,लेकिन जातिवाद को कोसने वाली विचारधारा रखने वाले महान व्यक्तियों को इस बात पर सहमत होना चाहिए की जब आरक्षण नही था,यानि 1000-1932 तक तब क्या इन्होने जाति व्यवस्था का विरोध किया था| जब दलितों को शुद्र की संज्ञा दी जाति थी और शिक्षा/रोजगार/राजनैतिक/सामाजिक अधिकार इनसे उछूते थे और इन्हें समाज में अछूत कहा जाता था| और आज जब इनका सामाजिक/राजनैतिक उभार हुआ है तो अब यह जातिवाद बन गया…

उ0प्र0 चुनाव 2017

नमस्कार देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के इस लोकतान्त्रिक महोत्सव में आपका स्वागत है,एक बार जनता अपनी ताकत का प्रदर्शन करने को तैयार है,चुनावी बिगुल बज चूका है,राजनितीक पार्टियों की दुकाने सज चुकी है,अब जनता को अपनी राजनितिक पार्टियों की ओर आकर्षित करने की रस्सा-कशी होगी,आइये चलते है उ०प्र० के इस चुनावी मेले में- मैं राजनीती विज्ञानं का छात्र नही हूँ और न ही राजनैतिक प्रष्ठभूमि से आता हूँ और न ही चुनावी विशेषज्ञ पर एक यूपी वाले की तरह कहना चाहूँगा की इस आगामी विधानसभा चुनाव 2017 को लोकसभा चुनाव 2014 की तरह देखना बहुत बड़ी भूल है और देश के सबसे बड़े राज्य जहाँ लगभग 14 करोड़ मतदाता हों वहां आप किसी भी ओपिनियन पोल य सर्वे पर विश्वाश नही कर सकते,इस उ०प्र० के विधानसभा चुनावों में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण स्थानीय मुद्दे और धर्म-जाति समीकरण होते है जिससे जनता जमीनी स्तर पर प्रभावित होती है कुछ राष्ट्रिय मुद्दे भी शामिल हो सकते है यदि उसका प्रभाव सीधे आम जनता पर पड़ा हो,आज चर्चा गरम है की उ०प्र में अगली सरकार किसकी होगी? यहाँ मुख्यतः 4 पार्टिया (सपा,बसपा,भाजपा,कांग्रेस) अपनी जोर आजमाइश से जनता…